चातुर्मास में कौन से नियमों का पालन करें
चातुर्मास में इस्ट वस्तु का परित्याग और नियम
मनुष्य सदा प्रिय वस्तुकी इच्छा करता है। अतः जो चातुर्मास्यमें भगवान् नारायणकी प्रीतिंके लिये अपने प्रिय भोगोंका पूर्ण प्रयत्नपूर्वक त्याग करता है, उसकी त्यागी हुई वे वस्तुएँ उसे अक्षयरूपमें प्राप्त होती हैं। जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक प्रिय वस्तुका त्याग करता है, वह अनन्त फलका भागी होता है। धातुपात्रोंका त्याग करके पलाशके पत्तेमें भोजन करनेवाला मनुष्य ब्रह्मभावको प्राप्त होता है। गृहस्थ मनुष्य ताँबेके पात्रमें कदापि भोजन न करे । चौमासेमें तो ताँबेके पात्रमें भोजन विशेषरूपसे त्याज्य है । मदारके पत्तेमें भोजन करनेवाला मनुष्य अनुपम फलको पाता है। चातुर्मास्यमें विशेषतः वटके पत्रमें भोजन करना चाहिये। चातुर्मास्यमें भगवान् विष्णुकी प्रीतिके लिये गृहस्थ आश्रमका परित्याग करके बाह्य आश्रमका सेवन करनेवाले मनुष्यका पुनर्जन्म नहीं होता। मिर्च छोड़नेसे राजा होता है, रेशमी वस्त्रोंके त्यागसे अक्षय सुख मिलता है, उड़द और चना छोड़ देनेसे पुनर्जन्मकी प्राप्ति नहीं होती । चातुर्मास्यमें विशेषतः काले रंगका | वस्त्र त्याग देना चाहिये। नीले वस्त्रको देख लेनेसे जो दोष लगता है, उसकी शुद्धि भगवान् | सूर्यनारायणके दर्शनसे होती है। कुसुम्भ रंगके परित्याग करनेसे मनुष्य यमराजको नहीं देखता । केशरके त्यागसे वह राजाका प्रिय होता है । फूलोंको छोड़नेसे मनुष्य ज्ञानी होता है, शय्याका | परित्याग करनेसे महान् सुखकी प्राप्ति होती है । असत्यभाषणके त्यागसे मोक्षका दरवाजा खुल | जाता है। चातुर्मास्यमें परनिन्दाका विशेषरूपसे परित्याग करे । पर – निन्दा महान् पाप है, पर निन्दा महान् भय है, पर – निन्दा महान् दुःख है और पर- निन्दासे बढ़कर दूसरा कोई पातक नहीं है* । पर- निन्दाको सुननेवाला भी पापी होता है। चौमासेमें केशोंका सँवारना (हजामत ) त्याग दे तो वह तीनों तापोंसे रहित होता है । जो भगवान्के शयन करनेपर विशेषतः नख और रोम धारण किये रहता है, उसे प्रतिदिन गंगास्नानका फल मिलता है। मनुष्यको सब उपायोंद्वारा योगियोंके ध्येय भगवान् विष्णुको ही प्रसन्न करना चाहिये। समस्त वर्णों एवं श्रेष्ठ पुरुषोंके द्वारा भी भगवान् श्रीहरिका ही चिन्तन करना चाहिये। भगवान् विष्णुके नामसे मनुष्य घोर बन्धनसे मुक्त हो जाता है। चातुर्मास्यमें उनका विशेषरूपसे स्मरण करना उचित है।
कर्ककी संक्रान्तिके दिन भगवान् विष्णुका भक्तिपूर्वक पूजन करके प्रशस्त एवं शुभ जामुनके फलोंसे अर्घ्य देना चाहिये । अर्घ्य देते समय इस भावका चिन्तन करे– ‘छः महीनेके भीतर जहाँ कहीं भी मेरी मृत्यु हो जाय तो मानो मैंने स्वयं ही अपने-आपको भगवान् वासुदेवके चरणोंमें ही समर्पित कर दिया।’ सर्वथा प्रयत्न करके भगवान् जनार्दनका सेवन करना चाहिये। जो मनुष्य भगवान् विष्णुकी कथा, पूजा, ध्यान और नमस्कार सब कुछ उन्हीं श्रीहरिकी प्रसन्नताके लिये करता है, वह मोक्षका भागी होता है। सत्यस्वरूप सनातन विष्णु वर्णाश्रम धर्मके स्वरूप हैं । जन्म मृत्यु आदिके कष्टका उन्हींके द्वारा नाश होता है । अतः चातुर्मास्यमें विशेषरूपसे व्रतद्वारा श्रीहरिको ही ग्रहण करना चाहिये । तपोनिधि भगवान् नारायणके शयन करनेपर अपने इस शरीरको तपस्याद्वारा शुद्ध करना चाहिये । भगवान् विष्णुकी भक्तिसे युक्त जो व्रत है, उसे विष्णुव्रत जानो। धर्ममें संलग्न होना तप है । व्रतोंमें सबसे उत्तम व्रत है— ब्रह्मचर्यका पालन । ब्रह्मचर्य तपस्याका सार है और महान् फल देनेवाला है । इसलिये समस्त कर्मोंमें ब्रह्मचर्यको बढ़ावे । ब्रह्मचर्यके प्रभावसे उग्र तपस्या होती है। ब्रह्मचर्यसे बढ़कर धर्मका उत्तम साधन दूसरा नहीं है। विशेषतः चातुर्मास्यमें भगवान् विष्णुके शयन करनेपर यह महान् व्रत संसारमें अधिक गुणकारक है – ऐसा जानो । जो इस वैष्णवधर्मका पालन करता है, वह कभी कर्मोंसे लिप्त नहीं होता । भगवान्के शयन करनेपर जो यह प्रतिज्ञा करके कि– ‘हे भगवन्! मैं आपकी प्रसन्नताके | लिये अमुक सत्कर्म करूँगा ।’ उसका पालन करता है, तो उसीको व्रत कहते हैं । वह व्रत अधिक गुणोंवाला होता है। अग्निहोत्र, ब्राह्मणभक्ति, धर्मविषयक श्रद्धा, उत्तम बुद्धि, सत्संग, विष्णुपूजा, सत्यभाषण, हृदयमें दया, सरलता एवं कोमलता, मधुर वाणी, उत्तम चरित्रमें अनुराग, वेदपाठ, चोरीका त्याग, अहिंसा, लज्जा, क्षमा, मन और इन्द्रियोंका संयम, लोभ, क्रोध और मोहका अभाव, इन्द्रियसंयममें प्रेम, वैदिक कर्मोंका उत्तम | ज्ञान तथा श्रीकृष्णको अपने चित्तका समर्पण-ये नियम जिस पुरुषमें स्थिर हैं, वह जीवन्मुक्त कहा गया है । वह पातकोंसे कभी लिप्त नहीं होता । एक बारका किया हुआ व्रत भी सदैव महान् फल देनेवाला होता है । चातुर्मास्यमें ब्रह्मचर्य आदिका सेवन अधिक फलद होता है। चातुर्मास्यव्रतका अनुष्ठान सभी वर्णके लोगोंके |लिये महान् फलदायक है । व्रतके सेवनमें लगे हुए मनुष्योंद्वारा सर्वत्र भगवान् विष्णुका दर्शन होता है। चातुर्मास्य आनेपर व्रतका यत्नपूर्वक पालन करे । विष्णु, ब्राह्मण और अग्निस्वरूप तीर्थका सेवन करे। चारों वेदमय स्वरूपवाले | अजन्मा विराट् पुरुषको भजे, जिनके प्रसादसे मनुष्य मोक्षरूपी महान् वृक्षके ऊपर चढ़ जाता है और कभी सन्तापको नहीं प्राप्त होता ।
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