वर्गोत्तम गृह किसे कहते हैं? यदि कोई गृह लग्न कुंडली में नीच अवस्था में है तथा नवमांश कुंडली के कीस राशि में है तो क्या वर्गोत्तम होगा vargotam.
वर्गोत्तम (vargotam) ग्रह : जो ग्रह वर्गोत्तम होता है वह अत्यंत ही शक्तिशाली एवं विशेष प्रभवकारक होता है। यह ग्रह विशेष शुभ फल देने का सामर्थ्य रखता है। वर्गोत्तम ग्रह वह है जो राशि चक्र एवं नवांश चक्र में एक ही राशि में स्थित हो । वर्गोत्तम ग्रह जातक को गुणोत्तम बनाता है अर्थात वह अपने वर्ग का
स्वराशि वर्गोत्तम : यदि ग्रह जन्म चक्र में स्वराशि में हो तथा नवांश में भी अपनी स्वराशि में स्थित हो । यह अत्यंत महत्वपूर्ण है । स्वराशि में वर्गोत्तम ग्रह भी शुभ फल दने वाला होता है ।
उच्च वर्गोत्तम : ग्रह यदि दोनो जन्म लग्न एवं नवांश पत्रिका में अपनी उच्च राशि में हो तो इसे उच्च वर्गोत्तम कहते है । ऐसा ग्रह विशेष फलकारक एवं शुभत्व प्रभावकारक होता है ।
नीच वर्गोत्तम : यदि ग्रह लग्न कुंडली में नीच राशि एवं तथा नवमांश पत्रिका में भी नीच नवांश में स्थित हो तो इसे नीच वर्गोत्तम कहते है । इससे ग्रह की अशुभता कम होती है एवं ग्रह नीच राशि में स्थित होते हुए भी शुभ फलदायक होता है ।
पाप वर्गोत्तम : यदि कोई ग्रह पाप राशि अथवा नवांश में स्थित हो तो इसे पाप वर्गोत्तम कहते है । शनि एवं मंगल पाप ग्रह है । इन ग्रहो की राशियो में लग्न पत्रिका एवं नवमांश दोनो में स्थित होने पर ग्रह पाप वर्गोत्तम कहलाता है । इससे ग्रह की अशुभता कम होती है एवं ग्रह पाप राशि में स्थित होते हुए भी शुभ फलदायक होता है ।
चर वर्गोत्तम : यदि ग्रह चर राशियों ( 1,4,7,10) तथा उसी चर नवांश में स्थित हो तो उसे चर वर्गोत्तम कहते है । ऐसे ग्रहों की दशा अथवा अन्तर्दशा में व्यक्ति अपने काम-काज एवं विचारों में अधिक चंचल हो जाता है ।
स्थिर वर्गोत्तम : यदि ग्रह स्थिर राशि (2,5,8,11) एवं उसी स्थिर नवांश में हो तो इसे स्थिर वर्गोत्तम कहते है । ऐसे ग्रह का दशा एवं अन्तर्दशा में व्यक्ति स्थायित्व वाले विचारों का हो जाता है। एक बार किसी विषय पर मन बनाने के बाद उसे बदलना इस दशा में संभव नही होता है ।
द्विस्वभाव वर्गोत्तम : यदि कोई ग्रह द्विस्वभाव राशि (3,6,9,12) में हो तथा उसी नवांश में हो तो ऐसी स्थिति को द्विस्वभाव वर्गोत्तम कहते है । ऐसी दशा, अन्तर्दशा में व्यक्ति अपने विचारों एवं कार्यो को गति प्रदान करता है । ऐसी स्थिति
में यदि ग्रह राशि कुछ अंतिम अंश पर हो तो गति ही चिंता का विषय बन जाती है तथा अन्धकार की ओर ले जाती है।
धर्म अथवा अग्नि वर्गोत्तम : यदि ग्रह धर्म अथवा अग्नि तत्व राशियों (1,5,9) में हो तथा उसी नवांश में हो यह धर्म अथवा अग्नि वर्गोत्तम स्थिति है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति उन व्यक्यिों को सजा देने की चेष्टा करता है जो समाज के नियमों का उल्लंघन करते है । ऐसी स्थिति में वह उपदेशों द्वारा भी व्यक्ति में अपेक्षित परिवर्तन लाने का प्रयास करता है । इन प्रयासों का मुख्य उद्देश्य समाज के नियमों का संरक्षण है ।
पृथ्वी तत्व अथवा अर्थ वर्गोत्तम : यदि ग्रह पृथ्वी या अर्थ राशि (2,6,10) एवं उसी नवांश में हो तो यह स्थिति पृथ्वी अथवा अर्थ वर्गोत्तम कहलाती है। ऐसी दशा एवं अन्तर्दशा में व्यक्ति आशा से अधिक धन कमाता है । परिवार का विस्तार भी संभव है। परिवार में खुशी का संचार होता है । यदि वर्गोत्तम ग्रह मकर में हो तो व्यक्ति अपने मालिक के मुख्य कार्यकर्ता के रुप में धन अर्जित करता. vargotam
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