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Shani Grah Ka Vibhinn Rashiyo Me Prabhav : शनि ग्रह का विभिन्न राशियों में प्रभाव

astrologer

जानिए आपकी रशिअनुसार शनि भगवान का आपकी कुंडली में क्या प्रभाव है ?

मेष : –

मेष राशी का स्वामी मंगल है | शनि मंगल से शत्रुता का भाव रखता है | मंगल शनि से समता का भाव रखता है | शनि मेष राशी में नीच का होता है इसलिए नीच व अशुभ प्रभाव देता है | शनिं के मेष राशी पर स्थित होने से जातक दुराचारी होता है | जातक भाग्यहीन व दुष्ट आचरण वाला होता है | जातक दंंभी हठी व छल कपट वाला होता है | जातक के अल्प मित्र होते है | एव जातक आलसी होता है | तथा अपने कार्यो को दुसरे के भरोसे छोड़ देता है एव धनहीन होता है |

वृषभ : –

वृषभ राशी का स्वामी शुक्र है | शुक्र व शनि आपस में मित्र है इसलिए वृषभ राशी शनि की मित्र राशी है | वृषभ राशी में स्थित शनि के प्रभाव से जातक अपने वचनों का पालन नहीं करता है एव झूठा होता है | जातक ईर्शायालू होता है निर्धन होता है | जातक निर्दयी व चपल होता है | जातक को व्यर्थ के वाद- विवाद में आनंद प्राप्त होता है |

मिथुन : –

मिथुन राशी का स्वामी बुध है | शनि बुध से मित्रता का भाव रखता है किन्तु बुध शनि से समता का भाव रखता है | बुध बुद्धि का कारक है एव शनि तामसिक क्रूर ग्रह है | इस कारन शनि बुद्धि को मलिन करता है | मिथुन राशी में शनि के स्थित होने से जातक कपटी एव दुराचारी होता है | जातक पाखंडी एव लज्जाहिन् भी होता है | जातक को धन व संतान का सुख प्राप्त नहीं होता | जातक हृदय मलिन होता है कमी होता है तथा मलिन अपने कुटुंबियो से द्वेष भाव रखता है |

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कर्क : –

कर्क राशी का स्वामी चन्द्रमा है | शनि चन्द्रमा से वैर भाव रखता है इसलिए कर्क राशी शनि की शत्रु राशी होती है | कर्क राशी में शनि के स्थित होने से जातक बाल्या अवस्था में दु:खी रहता है | जातक की माता को कष्ट रहता है | जातक का दुर्बल शरीर होता है किन्तु उन्न्न्तिशील और विद्वान होता है | जातक असंतुष्ट व कष्ट प्राप्त करता है | जातक को जीवन के उत्तराध्र में सफलता प्राप्त होती है |

सिंह : –

सिंह राशी का स्वामी सूर्य है | सूर्य व शनि की नैसर्गिक शत्रुता होती है अत: शनि के सिंह राशी में स्थित होने से जातक का सामान्य शरीर होता है | जातक बहुत अधिक बोलने वाला होता है | जातक को घोर परिश्रम के बाद भी सुख की प्राप्ति नही हो पाती है | जातक का दाम्पत्य जीवन मध्यम होता है | जातक अध्यापन या लेखन के कार्य में सलग्न रहता है | जातक कार्यो में दक्षता हासिल करता है |

कन्या : –

कन्या राशि का स्वामी बुध है। शनि बुध से मित्रता का भाव रखता है किन्तु बुध शनि से समता का भाव रखता है। बुध बुद्धि का कारक है एवं शनि तामसिक व क्रूर ग्रह है। इस कारण शनि बुद्धि को मलीन करता है । कन्या राशि में शनि के स्थित होने से जातक बलवान होता है जातक कम बोलता है एवं परोपकार में सलंग्न रहता है। जातक की विचारधारा संकीर्ण होती है। जातक धनवान होता है। जातक अच्छा कार्यकर्त्ता होता है तथा लेखन व संपादन में विशेष रूचि होती है।

तुला : –

तुला राशि का स्वामी शुक्र है। शुक्र व शनि मित्र है । तुला शनि की उच्च राशि है। इसलिए शनि तुला राशि में विशेष प्रभाव प्रदान करता है। शनि के तुला राशि में स्थित होने से जातक सम्माननीय व यशस्वी होता है। जातक उन्नति के लिए कार्यरत रहता है। जातक अपने स्वभाव के कारण नेता व उच्च पद को प्राप्त करता है । ऐसा जातक न्यायविद् कानून का जानकार एवं एक से अधिक विवाह करने वाला भी होता है ।

वृश्चिक : –

वृश्चिक राशि का स्वामी मंगल है। वृश्चिक राशि में शनि के स्थित होने से जातक का शरीर दुर्बल होता है। जातक अति क्रूर, कठोर एवं निर्दयी होता है। जातक व्याकुल व दुखी रहता है तथा व्यर्थ ही क्रोध करता है। जातक आक्रामक व हिंसक स्वभाव का होता है लोभी व कुसंगति वाला होता है। जातक को स्त्री का सुख प्राप्त नहीं होता। कई बार अनायास ही व्यर्थ की उलझन में फस जाता है।

धनु : –

धनु राशि का स्वामी गुरु है । गुरु व शनि एक दूसरे से समता का भाव रखते है। धनु राशि में शनि के स्थित होने से जातक का स्थूल शरीर होता है। जातक जीवन के उत्तरार्द्ध में अधिक सुखी होता है। ऐसे जातक की वृद्धावस्था सुखमय होती है। जातक सदाचारी व व्यवहार कुशल होता है। जातक का पुत्र जातक को प्रसिद्धि दिलाता है। जातक धैर्यवान होता है तथा अधिक खर्चीला होता है।

मकर : –

मकर राशि का स्वामी स्वयं शनि होता है। मकर राशि शनि की स्वराशि है जिसक कारण शनि के शुभ प्रभाव प्राप्त होते है। मकर राशि में शनि के स्थित होने से जातक श्याम वर्ण का होता है। जातक की तीव्र बुद्धि होती है। जातक मिथ्याभाषी व शंकालू स्वभाव का होता है। जातक परिश्रमी होता है एवं अपने परिश्रम के कारण सम्मान प्राप्त करता है। जातक की भगवान में अटूट आस्था होती है प्रवासी होता है शिल्प कला से धर्नाजन करता है। जातक भोगी होता है एवं परस्त्री में रत भी रहता है।

कुंभ : –

कुंभ राशि का स्वामी स्वयं शनि है। कुंभ राशि के 20 अंश तक शनि मूलत्रिकोण में होता है। इसके बाद 20 से 30 अंश तक शनि स्वराशि का होता है। मूलत्रिकोण राशि में होने से शनि के शुभ प्रभाव में वृद्धि होती है। स्वराशि का प्रभाव भी शुभ किन्तु मूलत्रिकोण से कुछ कम होता है। शनि के कुंभ राशि में स्थित होने से जातक मध्यम शरीर वाला, परिश्रमी एवं गंभीर विचारक होता है। जातक व्यवसाय में लिप्त रहता है। ईश्वर के प्रति जातक की आस्था नही रहती है। जातक परधन के प्रति लालायित रहता है। वृद्धा अवस्था में हृदय रोग होता है।

मीन : –

मीन राशी का स्वामी गुरु है | गुरु व शनि एक दुसरे से समता का भाव रखते है | शनि के गुरु की राशी में स्थित होने से शुभ प्रभावों में वृद्धि होती है। शनि के मीन राशि में स्थित होने से जातक अच्छे चरित्र वाला होता है। जातक विनयशील बिना विचार करके कार्यो को करता है। जातक अतिउत्साही भी होता है शिल्पकार होता है या शिल्पकला में रूचि रखता है ।


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