dhan upay

Dhan Upay | धन की प्राप्ति के लिए कौन से मंत्र का जप करना चाहिए?

  • धन पाने के लिए मन लगाकर कोई भी कर्म और परिश्रम किया जाए, तो पराक्रम और धन दोनो बढ़ते हैं। मंत्र द्वारा मन की शुद्धि होने से धन की वृद्धि होने लगती है। अमृतम पत्रिका, ग्वालियर से साभार

ऋग्वेद के सूक्त की एक ऋचा में कहा है कि

नाना श्रान्ताय श्रीरस्ति, पायोनृप करोजनः।

इन्द्र इधरत सखा, चरैवेति चरैवेति।।

  • अर्थात् बिना परिश्रम के लक्ष्मी की प्राप्ति नहीं होती।आलसी व्यक्ति पाप का भागी होता है और परिश्रम करने वाले व्यक्ति का मित्र स्वयं ईश्वर होता है। इसलिए परिश्रम करो, परिश्रम करो।

उषस्तमश्यां यश से सुबीरे, दास प्रवर्ग रयिमश्व बुध्यम्।

सुदंससा श्रवसा या विभासि वाजप्रसूता सुभगे बृहन्तम्॥अर्थात् हे सौभाग्यवती महालक्ष्मी! हमें सुन्दर पुत्रों, सेवकों एवं अश्वों से युक्त उस धन की प्राप्ति कराओ, जिसे तुम अपनी शक्ति और परिश्रम द्वारा प्रेरित करने में समर्थ हो।परिश्रम के साथ ही, लक्ष्मी की प्राप्ति के लिए मनुष्य का चरित्रवान होना भी आवश्यक है, वे कर्तव्यनिष्ठ हों।धर्म का अनुसरण करते हों, क्षमाशील हों, वृद्ध व्यक्तियों का सम्मान करते हों, स्वच्छ रहते हों, शान्ति प्रिय हों तथा आपस में मिलजुलकर रहते हों। इस प्रकार के गुणसम्पन्न व्यक्तियों पर ही लक्ष्मी प्रसन्न होती है।अस्ते भाग आसीनस्योर्ध्व तिष्ठति तिष्ठतः।शेते निपद्यमानस्य चराति चरते भाग, चरैवेति, चरैवेति।।अर्थात् बैठे हुए का भाग्य बैठा रहता है। खड़े हुए का खड़ा हो जाता है। सोते हुए का भाग्य सोता रहता है और चलने वाले का भाग्य चलता रहता है। इसलिए परिश्रम करते रहो, परिश्रम करते रहो।

उत्तिष्ठंस्त्रेता भवति कृतं संपद्यते चरनू, चरैवेति, चरैवेति।।

अर्थात् जो सो रहा है, वह कलियुग है, निद्रा छोड़कर बैठने वाला द्वापर है, खड़ा हो जाने वाला त्रेता है और श्रम करने वाला सतयुग है । इसलिए परिश्रम करते रहो, परिश्रम करते रहो ।ब्रह्मवैवर्त पुराण में स्वयं श्रीलक्ष्मी कहती हैत्यागः सत्यश्च शुचिश्च यत्र एते महागुणाः यः प्राप्तोति गुणनेतान।अर्थात् जो व्यक्ति शिव की तरह योग, त्यागी, सबका भला और सत्याचरण करने वाला और तन मन से पवित्र है, ऐसा व्यक्ति ही मुझे प्रिय है।वसामि नित्यं सुभगे प्रगल्भे दक्षे नरे कर्मणि वर्तमानंअक्रोधने देवपरे कृतज्ञे जितेन्द्रिय नित्यमुदीर्णसत्त्वे।।

अर्थात् जो व्यक्ति सौभाग्यशाली, निर्भीक और कार्यकुशल है। कार्य करने में प्रसन्नता अनुभव करता है, क्रोध से परे है, महादेव ईश्वर की आराधना करता है, उपकार को मानने वाला, जितेन्द्रीय और सतोगुण से युक्त है, ऐसे व्यक्ति में, मैं सदैव निवास करती हूँ।हमारे यहाँ महिलाओं को गृह-लक्ष्मी कहा गया है। परिवार की व्यवस्था को भली भांति और सुचारु ढंग से संचालित करने में उनकी उल्लेखनीय भूमिका रहती है। इसलिए उनमें लक्ष्मी का अंश सहज रूप में विद्यमान है। फिर भी लक्ष्मी की पर्याप्त कृपा प्राप्त करने के लिए उनका भी परिश्रमी, मृदुभाषी और चरित्रवान होना आवश्यक है।

सत्यासु नित्यं प्रियदर्शनासु सौभाग्ययुक्तासु गुणान्वितासुबसामि नारीषु पतिव्रतासु कल्याणशीलासु विभूषितासु॥

अर्थात् जो महिलाएँ अपनी स्पष्टवादिता और शिष्ट वेशभूषा के कारण सौम्य लगती हैं, जो सौभाग्यशाली गुणवती, पतिव्रता पवित्र आचार विचार वाली एवं वस्त्राभूषणों से सुसज्जित रहती हैं, ऐसी स्त्रियों में मैं सदैव निवास करती हूं।धन प्राप्ति का उपाय और मंत्रश्री महालक्ष्मी तंत्र के अनुसार भगवान शिव ने श्रीगणेश और भगवान कार्तिकेय को उपदेश दिया कि हमारे सभी कर्म शरीर से होते हैं। लेकिन मुख हमेशा कार्य मुक्त रहता है। इसलिए कोई भी कार्य करते हुए इस मुख से अपने गुरुमंत्र का जप करते रहो। हमेशा समृद्धि में वृद्धि होगी।

मंत्र जाप का महत्व शिवपुराण में भी अत्याधिक बताया है। जप की महिमा से बड़े से बड़े कार्य सिद्ध होने लगते हैं।स्कंध पुराण के अनुसार इस मुख को कभी भी बिना मंत्र के मत छोड़ो। ये मुख केवल मात्र मंत्र जपने के लिए ही बनाया है।ज्योतिष रत्नावली के मुताबिक जन्मपत्रिका में वाणी, मुख, धन और स्थाई संपदा का स्थान दूसरा है अर्थात कुंडली के द्वितीय भाव से जातक के धन की स्थिति का अंकल किया जाता है। अतः साधक के मंत्र जाप से ही धन की बढ़ोतरी होगी। अन्य दूसरा कोई उपाय नहीं है।रावण रचित मंत्र महोदधी के हिसाब से ऐश्वर्य पाना है, तो भोलेनाथ ईश्वर की शरण में जाना ही पड़ेगा और यहां तक पहुचने के लिए मंत्र जाप सबसे सुगम साधन है।श्री गणपति रहस्य था रहस्योपनिषद के अनुसारभौतिकसुख, वैभव, संपदा के दायक परम शिव भक्त दैत्यगुरु शुक्राचार्य ने शिव की भक्ति से संजीवनी विद्या और अनेक सिद्धियां पाईं।गुरु शुक्राचार्य ने अपने प्रिय शिष्य श्रीगणेश को गुरु मंत्र दिया और एक लाख पुनश्चरण करने का आदेश दिया और गणेश जी सदियों से प्रथम पूज्य हैं।भगवान कार्तिकेय ने अपने गुरु समुद्र ऋषि से हस्त रेखा का ज्ञान लिया। महर्षि अगस्त्य से दीक्षा ग्रहण कर गुरुमंत्र के 11 लाख पुनश्चरण जपकर किए।

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