श्री रावण संहिता (प्रथम खण्ड) श्री रावण संहिता (प्रथम खण्ड) – Life Story of Ravana: Insights from Rishi Agastya
रावण जीवन वृत्तम
श्री रावण संहिता (प्रथम खण्ड) – Life Story of Ravana: Insights from Rishi Agastya प्रस्तुत खण्ड रावण के समस्त जीवन की घटनाओं तथा उनके क्रिया-कलापों
का ब्यौरा है। परम तेजस्वी महर्षि अगस्त्य जी ने दशरथ पुत्र रघुवंशी रामचन्द्रजी
द्वारा रावण के जीवन वृत्त के विषय में विस्तार से जानने की इच्छा प्रकट की तो
उन्हें सविस्तार ऋषि अगस्त्य जी ने रावण जीवन का जो वर्णन किया, उसे यहां
संक्षिप्त में दिया जा रहा है।
अगस्त्य उवाच-शृणु राम तथा वृत्तम् तस्य तेजो बलम् महत्। जघान शत्रून ये
नासो न च वध्यः स शत्रुभिः। तावत् ते रावणस्थेदं कुलं जन्म च राघव। वर प्रदानं च
तस्मै दत्तं ब्रवीमि ते ।।2।। पुरा कृत युगे राम प्रजापतिः सुतः प्रभुः। पुलस्त्यो नाम महर्षि:
साक्षादिव पितामहः ।।3।। नानुकीर्त्या गुणास्तस्य धर्मतः शीलतस्थः। प्रजापतेः पुत्र इति
वक्तुं शक्यं हि नामतः ।।4।।
भाषा टीका-महान् तेजस्वी ऋषि श्रेष्ठ महर्षि अगस्त्य जी रघुकुल नन्दन
श्रीराम को सम्बोधित कर बोले- हे राम ! इन्द्रजीत (मेघनाद) के महान् तेज और बल
का वृत्तांत सुनो। जिससे वह शत्रुओं को मार गिराता था तथा स्वयं किसी शत्रु से नहीं
मारा जाता था। हे राम ! इस विषय का वर्णन करने से पूर्व रावण के कुल वृत्तांत के
सम्बन्ध में सुनो। प्राचीनकाल में ब्रह्माजी के पुलस्त्य नाम के पुत्र हुए। वे महान तेजस्वी
तथा घोर साधक थे। एक बार वे महागिरि सुमेरु पर्वत पर राजर्षि तृणविन्दु के आश्रम
में स्वाध्याय में संलग्न थे। वहां ऋषियों-मुनियों के कार्य में बाधा डालने तथा मनोरंजन
के लिए देव-गन्धर्व कन्यायें आया करतीं तथा उन्हें परेशान करतीं। इससे परेशान
होकर एक दिन पुलस्त्य जी ने घोषणा की कि आज से जो कन्या मेरे सामने पड़ेगी
वह दृष्टि मात्र से गर्भवती हो जायेगी। इस घोषणा के डर से वे कन्यायें डर गयीं तथा
उनके आश्रम की तरफ नहीं जाती थीं। परन्तु राजर्षि तृणविन्द की कन्या उस समय
कहीं बाहर गयी थी उसे इस घटना का रंचमात्र भी ज्ञान न था। अतः वह अपनी सखियों
के संग क्रीड़ा करने की इच्छा से आश्रम गयी तथा सर्वप्रथम पुलस्त्य जी के पास ही
पहुंच गयी। उस समय वे स्वाध्याय में संलग्न थे उनकी दृष्टि पड़ते ही कन्या का
रूप-रंग एकाएक परिवर्तित हो गया तथा वह घबराकर घर वापस गयी तो सारा वृत्तांत
जानकर उनके पिता अत्यन्त चिन्तित हुए। सबने विचार करके वह कन्या मुनिश्रेष्ठ
परम तेजस्वी ब्रह्मपुत्र पुलस्त्य जी को सौंप दी। काफी समय वह उनकी सेवा में रहने
के बाद उसने एक पुत्र को जन्म दिया। पुलस्त्य दिया। पुलस्त्य जी ने उस कन्या से
कहा- हे बाले ! तुमने मेरी बहुत सेवा की है तथा उस समय जब मैं वेदों का पाठ कर
रहा था तब तुमने गर्भ धारण किया। इसलिए यह बालक भी मेरे समान महान् तपस्वी
तेजस्वी होगा। इसका नाम ‘विश्रवा‘ होगा।
बड़े होकर विश्रवा भी घोर तप में संलग्न हो गये तथा बहुत ज्ञानार्जन कर लिया।
उनके तेज गुण से प्रभावित होकर महामुनि भारद्वाज ने अपनी पुत्री जो देवांगनाओं के
समान परम सुन्दरी व शीलवान थी उनका विवाह विश्रवा के साथ कर दिया। काफी
समय पश्चात् भारद्वाज कन्या ने विश्रवा के संयोग से एक पुत्र को जन्म दिया जिसका
नाम उनके पितामह पुलस्त्य ने वैश्रवण रखा जो बाद में ब्रह्माजी की घोर तपस्या करके
लोकपाल बनने का वरदान प्राप्त किया तथा वैश्रवण कुबेर धनाध्यक्ष कहलाये। ये परम
तेजस्वी देवताओं के समान ओज वाले तथा महान् पराक्रमी थे। ब्रह्मा द्वारा लोकपाल
बना दिये जाने के बाद इन्होंने अपने पिता से अनुमति लेकर प्रजापति ब्रह्मा द्वारा निर्मित
अत्यन्त सुन्दर सुवर्ण नगरी लंकापुरी जो काफी समय से भगवान विष्णु द्वारा राक्षसों
का संहार करने के बाद खाली पड़ी थी। जो राक्षस बच गये वे रसातल को चले गये।
वैश्रवण ने उसी नगरी को अपना निवास स्थान बनाया तथा ब्रह्माजी ने प्रसन्न होकर
इन्हें पुष्पक विमान भी दिया जिससे वे कभी-कभी अपने पिता, पितामह से मिलने
ब्रह्मलोक जाया करते। ये महान् धर्मज्ञ तथा तपस्वी तेज लक्ष्मी की विशेष कृपा होने
तथा संसार का धनाध्यक्ष होने के कारण इनकी ख्याति चारों तरफ फैल गई।
महर्षि अगस्त्य जी की बात पूर्ण होने पर राम ने अत्यन्त जिज्ञासा से प्रश्न किया
कि मैंने तो सुना था कि रावण का जन्म ऋषि कुल में हुआ था वह राक्षस कैसे बना
तथा आपने उसे राक्षसी पुत्र बताकर मेरे मन में संशय डाल दिया कृपया सारी कथा
विस्तार से स्पष्ट समझायें।
महर्षि अगस्त्य जी स्वयं आश्चर्यचकित थे कि राम स्वयं भगवान विष्णु के
अवतार हैं, फिर भी ऐसा प्रश्न कर रहे हैं, फिर भी उन्होंने आगे कथा इस प्रकार बताई।
अगस्त्य उवाच – हे राम ! एक समय जब प्रजापति ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना
करने के बाद सर्वप्रथम जल का निर्माण किया तथा कुछ जलीय जीवों की उत्पत्ति
भी हुई तो वे अपनी भूख-प्यास से व्याकुल हो ब्रह्माजी के पास गये तथा अपनी क्षुधा
शांति का उपाय पूछा। इस पर प्रजापति ब्रह्माजी ने हंसकर कहा तुम सब इस जल की
रक्षा करो। उनमें से कुछ ने कहा हम इस जल का रक्षण करेंगे तथा कुछ ने कहा हम
इसका यक्षण (पूजन) करेंगे। तब भूत सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी बोले-तुममें से जिन्होंने
रक्षण की बात कही है वे राक्षस नाम से प्रसिद्ध होंगे तथा जिन्होंने यक्षण की बात कही
है वे यक्ष नाम से प्रसिद्ध होंगे। इस प्रकार ये जीव ‘राक्षस’ तथा ‘यक्ष’ नामक दो जातियों
में विभक्त हो गये। इनमें हेति तथा प्रहेति नामक दो बलशाली राक्षस, राक्षसों के स्वामी
बने। ये शत्रुओं का दमन करने में मधु-कैटभ के समान बलशाली थे। उनमें प्रहेति
धर्मात्मा तथा अति तप करने जंगल में चला गया। परन्तु प्रहेति समस्त राक्षसी गुणों से
युक्त मांस-मदिरा का सेवन करने वाला अत्यन्त विलासी था अतः वह सुन्दर स्त्री
की तलाश में चला गया। यह भी अत्यन्त बलशाली तथा बुद्धिमान तथा इसने स्वयं
प्रयास करके काल की बहन ‘भया’ जो अद्वितीय रूपसी थी। उससे विवाह कर
लिया।
कुछ समय पश्चात् हेति को पुत्र की प्राप्ति हुई। इसका नाम विद्युत केस रखा
गया। यह सूर्य के समान तेजस्वी था। युवा होने पर हेति ने अपने पुत्र का विवाह ‘संध्या’ की पुत्री सालकंटकटा के साथ कर दिया। विद्युत केश अपनी सुन्दरी पत्नी के साथ रमण करने लगा। घूमते-घूमते यह मन्दराचल पर्वत पर आया तथा अत्यन्त रमणीक तथा उसकी पत्नी अपनी रतिक्रीड़ा में इतने खो गये कि उन्हें पुत्र का ध्यान न रहा स्थान में उसकी पत्नी ने एक पुत्र को जन्म दिया जो काफी तेजस्वी बालक था। विद्युत वे उसे वहीं छोड़ अन्यत्र कहीं विहार करने चले गये। तत्पश्चात् भगवान शंकर तथा पार्वती उस मार्ग से जाते हुए अनाथ बालक को देखा। पार्वती जी को दया आ गयी। उन्होंने उस बालक को तुरन्त ही अपने माता-पिता के समान युवा होने का वरदान दिया साथ ही यह घोषणा भी की कि आज से राक्षस जाति की संतानें पैदा होते ही मेरे आशीर्वाद से अपने माता-पिता के समान युवा हो जायेंगे। इस बालक का नाम विद्युत केस का पुत्र होने के नाते सुकेश रखा गया। सुकेश अत्यन्त रूपवान व गुणवान था। सुकेश की धर्मनिष्ठा देखकर ग्रामणी नामक गन्धर्वी ने अपनी पुत्री देववती का विवाह इसके साथ कर दिया। दोनों कामदेव के समान सुन्दर तथा अत्यन्त तेजशाली थे। समय बाद सुकेश की पत्नी देववती ने तीन पुत्रों को जन्म दिया वे क्रमश:- माल्यवान, | कुछ माली, तथा सुमाली नाम से विख्यात हुए। ये तीनों अत्यन्त बलशाली तथा पराक्रमी थे। उन्हें जब अपने पिता के बारे में ज्ञात हुआ कि उन्होंने तप करके वर प्राप्त किया था अत: वे तीनों भी घोर तप साधना में संलग्न हो गये। काफी दिनों के तप के पश्चात् प्रजापति ब्रह्माजी प्रकट हुए तथा वर मांगने की याचना की। वे तीनों हाथ जोड़कर खड़े हो गये तथा बोले-हे भगवन् ! हमें अजेय, शत्रुनाश तथा चिरंजीवी होने का वरदान दीजिए तथा हममें एक-दूसरे के प्रति प्रेम सदैव बना रहे। ब्रह्माजी ने तथास्तु, कहा और चले गये। ये तीनों बलशाली राक्षस देवताओं, ऋषियों को सताने लगे कुछ समय पश्चात् अपने निवास स्थान हेतु प्रजापति ब्रह्माजी से निवेदन किया तो ब्रह्माजी ने दक्षिणी समुद्र में त्रिकूट पर्वत पर स्थित लंकापुरी जो तीस योजन चौड़ी तथा सौ योजन लम्बी थी यह स्वर्ण लंका राक्षसों के ही निमित्त बनायी गयी थी यहां निवास करने की आज्ञा दी। यहां रहते हुए चारों तरफ से समुद्री गहरी खाई से सुरक्षित राक्षस देवताओं, मुनियों का संहार करने लगे। इनकी शक्ति इतनी बढ़ गयी कि देवलोक में देवताओं को मार-मारकर अब भागने पर विवश कर दिया। समस्त देवतागण रक्षार्थ भगवान शंकर की शरण में गये तो शंकर जी ने ध्यान करके देखा तथा मुस्कराकर बोले आप सब इस समस्या के समाधान के लिए प्रजापति ब्रह्मा जी की शरण में जाओ। वही इनका संहार करेंगे। भगवान विष्णु ने तब राक्षसों का अत्याचार सुना तो भक्तों की रक्षा के लिए अपने वाहन गरुड़ पर सवार हो चक्र धारण कर देवताओं के साथ चल दिये। राक्षसों तथा भगवान विष्णु में काफी समय संघर्ष हुआ बहुत से राक्षस मारे गये तथा कुछ बच गये वे रसातल में चले गये। इस संघर्ष में माली मारा गया। माल्यवान तथा सुमाली भागकर रसातल में रहने लगे तथा लंकापुरी तभी खाली पड़ी थी।

एक बार काफी समय पश्चात् सुमाली नामक राक्षस पृथ्वी पर विचरण करने की इच्छा से आया तथा लंकापुरी में धनाध्यक्ष कुबेर को देखा उनका तेजबल तथादेवताओं के समान ओज देख मोहित हो गया। उसने विचार किया कि अपनी पुत्री का विवाह यदि कुबेर के पिता वैश्रवा के साथ कर दूं तो उसे भी कुबेर के समान ही तेजस्वी धर्मात्मा पुत्र होगा। इससे राक्षसों का मान बढ़ेगा तथा शक्ति भी इसी विचार को ले वह रसातल वापस जा अपनी पुत्री को मुनि वैश्रवा के आश्रम में ले जाकर उनकी सेवा में उपस्थित होने को कहा। उनकी पुत्री पिता की आज्ञा मान मुनि वैश्रवा के आश्रम में संध्या बेला में पहुंची मुनि वैश्रवा उस समय अग्नि होत्र कर रहे थे। वह चुपचाप उनके समीप जाकर खड़े हो गयी। मुनि अपनी क्रिया से निवृत्त होने पर उनका आने का अभिप्राय पूछा तो उसने कहा मैं अपने पिता की आज्ञा से आपकी सेवा में उपस्थित हुई हूं और ज्यादा क्या कहूं बाकी आप अपने तपोबल से स्वयं जान लीजिए। इस पर मुनि ने ध्यान से देखा सारी बात समझ गये और बोले-हे वाले ! तुम इस विकराल संध्या बेला में मेरे पास आयी हो जो शुभ घड़ी नहीं है। अतः जाओ तुम्हारी इच्छा पूरी होगी। परन्तु वह पुत्र भी परम तेज बलवान होते हुए राक्षस शरीर वाला होगा। वह कन्या रोने लगी। इस पर विश्रवा ने कहा तुम्हारे तीन पुत्रों में एक पुत्र में हमारे कुल का धर्म तथा तप बल होगा। वह बड़ा धर्मात्म तथा विष्णु भक्त होगा। यहीं रावण की उत्पत्ति होती है। कैकसी नामक राक्षसी से जो पहला पुत्र पैदा हुआ वह दस सिरों एवं बीस भुजाओ वाला परम तेजस्वी बालक हुआ। दूसरा कुम्भकर्ण नाम से प्रसिद्ध हुआ तथा तीसरा परम विष्णु भक्त विभीषण बना।
मुनि विश्रवा ने दस सिरों वाले बालक को देखकर कहा यह दस सिर लेकर पैदा हुआ है। इसलिए इसका नाम दसग्रीव होगा। दूसरा कुम्भकर्ण जो अति विशाल शरीरधारी तथा असीमित भोजन करने वाला था उसकी क्षुधा कभी समाप्त न होती वह भोजन की तलाश में धरती पर स्थित जीव-जन्तुओं तथा वनस्पतियों का भक्षण करने लगा तथा तीसरा पुत्र विभीषण परमशील भगवान विष्णु का भक्त था वह ईश्वर उपासना तथा जप में लगा रहता।
एक बार कुबेर अपने पिता को देखने आए। कैकसी कुबेर के तीव्र तेज तथा देवगुणों को देख रावण से बोली-तुम कुबेर के भाई हो तुम्हें भी उसके समान तेज बलशाली तथा पराक्रमी होना चाहिए। माता की प्रेरणा से ‘दशग्रीव’ रावण प्रजापति ब्रह्मा की उपासना करने लगा। हजार वर्ष पूरा होने पर उसने अपना एक मस्तक ब्रह्माजी की चरणों में हवन कुण्ड में डाल दिया। इसी प्रकार नौ हजार वर्ष पूर्ण होने तक नौ सिरों की आहुति दे दिया। दस हजारवां वर्ष पूर्ण होने पर पर ज्यों की अपना दसवां सिर काटने के लिए खड्ग उठाया प्रजापति ब्रह्माजी तुरन्त प्रकट हुए तथा उससे वर मांगने की याचना की। ब्रह्माजी के इस प्रकार कहे जाने पर वह हाथ जोड़ ब्रह्माजी को प्रणाम करके बोला-हे भगवन् ! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो ऐसा वर दीजिए कि मैं अमर हो जाऊं। ब्रह्माजी ने कहा मैं ऐसा वर नहीं दे सकता कोई अन्य वर मांग लो। फिर उसने कहा मैं गरुड़, नाग, यक्ष, दैत्य, दानव राक्षस तथा देवताओं के लिए अवध्य हो जाऊं। हे देवपूजित ! मुझे औरों की चिन्ता नहीं है। मुनष्य आदि प्राणियों को मैं तिनके के समान समझता हूं। महात्मा दसग्रीव के ऐसा कहने पर प्रजापति ने कहा ठीक है शिव उपासक श्री रावण संहिताजिन सिरों
को काटकर हवन कर दिया वे भी तुम्हें दुबारा प्राप्त हो जायेंगे। ब्रह्माजी से इस प्रकार आशीर्वाद पाकर रावण अत्यन्त प्रसन्न हो पुनः भगवान शंकर जो उनके आरार्ध्य देव थे उनकी साधना में संलग्न हो गया तथा भगवान शंकर को प्रसन्न कर उसने पुनः संसार “की सभी सर्वोत्तम विद्याओं, सिद्धियों को प्राप्त करके कुबेर से भी ज्यादा बलशाली पराक्रमी तथा शक्तिमान बन गया। महात्मा कुबेर शांत स्वभाव थे। वे अपने जप-तप
में लगे रहते थे।
एक बार रावण ने कुबेर को देखा पुष्पक विमान से आकाश मार्ग से जा रहे थे। रावण के मन में पुष्पक विमान प्राप्त करने की इच्छा हुई तो उसने तुरन्त कुबेर से युद्ध में परास्त कर पुष्पक विमान उनसे छीन लिया तथा सब प्रकार से सुरक्षित लंका नगरी को अपनी राजधानी बनाया और निर्भय राज्य करने लगा।
अगस्त्य उवाच-हे राम ! अब कुम्भकर्ण का वृत्तांत सुनो। कैकसी का दूसरा पुत्र जो रावण के समान ही बलशाली था ब्रह्माजी की तपस्या में वह भी रावण के साथ था। उसने जब वर मांगना चाहा तो देवताओं को घोर चिन्ता हुई तथा ब्रह्माजी से प्रार्थना किया कि यह अतिशय बलशाली राक्षस समस्त देव लोक को कम्पायमान करने की ताकत रखता है अत: इसे ऐसा वर दीजिए जिससे देवताओं का अहित न हो। इससे ब्रह्माजी ने सरस्वती को प्रेरित कर उससे छ: महीने की नींद तथा छः महीने जागरण का वर मांगा। इस प्रकार ब्रह्माजी से वरदान पा अतिशय बलशाली राक्षस कुम्भकर्ण छः महीने के लिए सो गया।
इसके पश्चात् प्रजापति ब्रह्माजी विभीषण के पास गये तो उसने दोनों हाथ जोड़ कर बोला-भगवन् ! मुझे परम पिता भगवान श्री हरि के चरणों की भक्ति प्राप्त होने का वरदान दीजिए। इस वरदान से ब्रह्माजी अत्यन्त प्रसन्न हुए तथा बोले- तथास्तु, ऐसा ही होगा। इस प्रकार रावण अपने भाइयों तथा अनुचरों के साथ रहने लगा।
कुछ समय पश्चात् रावण को अपनी बहन सूर्पणखा के विवाह की चिन्ता हुई। फिर उसने कालका के पुत्र दानवेन्द्र के साथ जिसका नाम विद्युत जिन्ह था उसके साथ सूर्पणखा का विवाह कर दिया।
एक समय शिकार करते-करते रावण गहन जंगल में चला गया। वहां उसने क्षिति पुत्र मय दानव को देखा। जिसके साथ एक परम सुन्दरी ओजवती कन्या थी। रावण उसे देख मय दानव से उसका परिचय पूछा। मय दानव बोला- तुमने स्वर्गलोक की हेमा अप्सरा का नाम अवश्य सुना होगा। यह उसी की पुत्री है। मैं उस पर आसक्त हो गया था सहस्रों वर्ष उसके साथ रमण करता रहा। 14 वर्ष पूर्व वह देवताओं के कार्य से देवलोक चली गयी। अब मैं पत्नी वियोग में इसी के साथ अकेला रहता हूं। मैंने उस हेमा के लिए सोने की नगरी लंका बनायी थी तथा उसी में निवास करता था, परन्तु अब जंगल में निवास करता हूं। अत: हे रावण ! मैं अपनी यह कन्या तुम्हें सौंपता हूं। तुम इसका पाणिग्रहण संस्कार करो। इसके दो भाई भी हैं उनका नाम मायवी तथा दुन्दुभी है। मय दानव के इस प्रकार कहे जाने पर रावण ने अपना परिचय दिया मैंपुलस्त्य ऋषि के पुत्र विश्रवा का पुत्र हूँ तथा मेरा नाम दशग्रीव है। मुनिराज विश्रवा ब्रह्मा की तीसरी पीढ़ी में जन्मे हैं।
फिर मुनि बोले-हे राम ! फिर वहीं अग्नि प्रज्ज्वलित कर रावण ने मन्दोदरी का पाणिग्रहण (विवाह) भी कर लिया। हे राम। मय दानव भी जानता था कि विश्रवा ने रावण को शाप भी दिया था फिर भी ब्रह्मा के कुल का जानकर उसने अपनी कन्या तथा अपने तपोबल से प्राप्त अद्भुत शक्ति भी उसे दे दी। जिसे बाद में रावण ने लक्ष्मण पर चलाया था। इसके बाद लंकेश्वर अपनी नगरी लंका में वापस आ गया। वहां से आते समय रावण अपने दोनों भाइयों के लिए भी दो-दो पत्नियों का अपहरण कर लाया। जिनमें वैरोचन नामक दैत्य (बलि) की ‘वज्रज्वाला’ नामक कन्या को कुम्भकर्ण की पत्नी बनाया तथा गन्धर्वराज महात्मा शैलून की कन्या ‘सरमा’ को जो धर्म-तत्त्व जानने वाली थी। से विभीषण की पत्नी बनाया। यह कन्या मानसरोवर तट पर उत्पन्न हुई थी उस समय मानसरोवर में बाढ़ आ गयी तथा भय से व्याकुल इसकी मां ने कहा (सरो मा वर्धस्य) अर्थात् हे सरोवर मत बढ़ो। इसीलिए इसका नाम ‘सरमा’ पड़ गया। इस प्रकार तीनों भाई सुखपूर्वक लंकापुरी में रहने लगे।
कुछ समय पश्चात् मन्दोदरी ने एक अति तेजवान बालक को जन्म दिया जिसका नाम मेघनाद रखा गया। यह मेघ समान गर्जना करने वाला तथा अतिशय बलशाली था। जन्म लेते ही यह रोते हुए बादलों के समान गर्जना की जिससे रावण अत्यन्त प्रसन्न हुआ तथा इसका नाम ‘मेघनाद’ रख दिया।
कुम्भकर्ण अपनी निद्रा से परेशान हो रावण से एक शयनागार निर्मित करने की प्रार्थना की। इस पर रावण ने दो योजन लम्बा तथा एक योजन चौड़ा चिकना संगमरमर पत्थर शिला को ही हीरे-जवाहरात, मणियों से जड़ाकर सुन्दर प्रकोष्ठ बनवा दिया जो काफी दर्शनीय था। कुम्भकर्ण जाकर इसमें सो गया। अब रावण देवताओं, ऋषियों तथा गन्धर्वों पर घोर अत्याचार करना शुरू कर दिया। सभी रावण की सेना व शक्ति से भयभीत रहते। देवलोक, इन्द्रलोक तथा पाताल लोक की समस्त सुन्दरी रूपसियों को रावण के अनचरों ने जीतकर अपनी अंकशायिनी बना लिया। इस प्रकार देवता रावण, कुम्भकर्ण तथा मेघनाद की शक्तियों से भयभीत हो भगवान विष्णु की शरण में गये तथा अपनी रक्षा की याचना की। भगवान विष्णु ने समय आने पर रावण के संहार का आश्वासन दिया।
जहां
रावण ने समस्त दानव, मानव, यक्षों, गन्धर्वों को परास्त कर अपने अधीन कर लिया एक बार वह अभिमानवश कैलास पर्वत पर गया तथा वहां प्रलयंकारी उत्पात मचाना शुरू कर दिया। शिवगणों के मना करने पर वापस लौट गया। पुनः वह अपने भाई कुबेर पर विजय पाने के बाद उस ‘शरवण’ नामक विशाल वन में गया, स्वामी कार्तिकेय का जन्म हुआ था। वहां पहुंच रावण ने शरवण पर दृष्टि डाली। सूर्य की किरणों से व्याप्त होने के कारण वह दूसरे सूर्य के समान प्रकाशित हो रहा था। वहीं एक रमणीक पर्वत था। वह उस पर चढ़ने को हुआ तो उसका विमान रुक गया। यह इच्छाधारी विमान क्यों रुक गया क्या कारण है तब मंत्रियों में बद्धिमान मारीचि ने इस प्रकार कहा- हे राजन् ! यह पुष्पक विमान अकारण ही नहीं रुक गया यहां अवश्य ही कोई ऐसी विभूति होगी जिसके तेज से विमान ने अपनी गति बन्द कर दी तभी भगवान् शंकर के गण नन्दी सामने आये तथा बोले- हे दशग्रीव! तुम यहां से लौट जाओ। इस पर्वत पर भगवान शंकर क्रीड़ा कर रहे हैं। गरुड़, देव, यक्ष, नाग, गन्धर्व, राक्षस तथा अन्य सभी प्राणियों को इस पर्वत पर पहुंचना अगम्य कर दिया गया है। नन्दीश्वर के वचनों को सुनकर राक्षस रावण क्रोध में भर गया। फलत: उसके कानों के कुण्डल हिलने लगे। क्रोध के कारण आंखें लाल हो गयीं। तदुपरान्त वह पुष्पक विमान से नीचे उतरते हुए बोला- यह शंकर कौन है ? तथा पर्वत के मूल भाग में जा पहुंचा। वहां पर उसने देखा कि भगवान शंकर से थोड़ी ही दूरी पर चमकते हुए त्रिशूल को हाथ में लिये हुए नन्दीश्वर दूसरे शिव के समान खड़े हुए हैं। उनके वानर जैसे मुंह को देखकर राक्षस रावण ने अवज्ञाभाव से जलपूर्ण बादल के समान गरजते हुए हंसना आरम्भ कर दिया। तब शंकर के द्वितीय रूप नन्दीश्वर क्रुद्ध होकर दशानन रावण से इस प्रकार कहा- हे रावण ! तूने मेरे जिस वानर रूप की अवज्ञा की है तथा वज्रपात के समान घोर अट्टहास किया है, उसी रूप वाले मेरे जैसे शक्तिशाली वानर तेरे कुल का वध करने के लिए उत्पन्न होंगे। हे राक्षस ! मैं तुझे अभी मार डालने की शक्ति रखता हूं पर मारूंगा नहीं। क्योंकि अपने कुकर्मों के कारण तू स्वयं ही मरा हुआ है। महात्मा नन्दी के यह कहने पर देवतागण खुशी से दुन्दुभी बजाने लगे तथा आकाश से सुमन की वर्षा करने लगे।
दुष्ट
रावण नन्दी के शब्दों पर कोई ध्यान नहीं दिया और उस पर्वत के समीप खड़े होकर इस प्रकार बोला-हे गोपति जिसने मेरी यात्रा के समय पुष्पक विमान की गतिं रोक दिया है। अपने सम्मुख खड़े उस पर्वत को मैं जड़ से उखाड़े देता हूं। शंकर किस प्रभाव से यहां प्रतिदिन राजा की भांति क्रीड़ा करते हैं ? क्या उनके लिए यह जानने योग्य कारण नहीं है कि भय का कारण मैं यहां उपस्थित हूं। हे राम ! यह कहकर रावण ने अपनी भुजाओं को पर्वत के निम्न भाग में लगाकर, शीघ्रतापूर्वक उठा लेना चाहा, जिसके कारण वह पर्वत हिलने लगा। पर्वत हिलने से शिवजी के सभी गण भयभीत होकर कांप उठे तथा पार्वतीजी विचलित होकर शंकर जी से लिपट गयीं। हे राम ! तब देवताओं में श्रेष्ठ शिवजी लीला करते हुए सहज भाव से अपने पांव के अंगूठे द्वारा उस पर्वत को दबा दिया। उस दबाव के पड़ते ही पर्वत स्तम्भ जैसी रावण की भुजायें पर्वत के नीचे दब गयीं। यह देखकर उस राक्षस के मंत्री आश्चर्यचकित रह गये। इस वेदना से रावण दर्द से चिल्ला पड़ा। उसके मंत्रीगण भयभीत हो गये। उन्हें लगा अब अन्त समय आ गया है। इन्द्र आदि देवता भी मार्ग में विचलित हो उठे। मंत्रियों ने भगवान को स्तुति करने का परामर्श दिया कि उनकी आराधना के बिना प्राण नहीं बच सकते।
इसके बाद रावण ने स्तोत्रों से भगवान की स्तुति किया तथा भगवान शंकर प्रसन्न होकर बोले-हे पुलस्त्य नन्दन ! दशग्रीव तुम्हारे आर्तनाद से तीनों लोकों के प्राणी कांप उठे अतः मैं तुम पर प्रसन्न हूं तथा अपनी तरफ से जाने की इजाजत देता है। तुम्हारेवध करने के लिए पुन: उत्पन्न होऊंगी। यह कह वह अग्नि में समा गयी। आकाश से पुष्पों की वर्षा होने लगी। वह दूसरे जन्म में एक कमल से उत्पन्न हुई। रावण ने उसे फिर प्राप्त कर लिया तथा कमल जैसी सुन्दर कन्या को लेकर घर आया। उसके मंत्रियों ने जब उसके शारीरिक लक्षण देखे तो बोले-यदि यह कन्या घर रही तो आपकी मृत्यु का कारण बनेगी। ऐसा दिखाई देता है। हे राम ! यह सुनकर रावण ने उसे समुद्र में फेंक दिया। तब वह पृथ्वी पर पहुंचकर राजा जनक के यज्ञ मण्डप में जा पहुंची तथा राजा द्वारा हल जोते जाने पर वह सती कन्या पुनः प्रकट हो गयी। हे महाबाहो वही आपकी पत्नी है। आप स्वयं सनातन श्री विष्णु हैं। उस पर्वताकार राक्षस को वेदवती ने अपने क्रोध से पहले ही मार डाला था, जिसे आपने शक्ति का परिचय देते हुए मारा है। रावण ने अपने जीवन काल में सहस्रों अपराध तथा निन्दनीय कार्य किये जिनका कारण उसकी असीमित शक्ति तथा ब्रह्माजी के वरदानवश कोई उसे परास्त नहीं कर पाया। इससे वह तीनों लोकों में अपना उत्पीड़न जारी रखा। अन्त में ऋषियों-मुनियों तथा देवताओं की बार-बार दुहाई देने के बाद भगवान विष्णु ने राम का अवतार लेकर उसे सकुटुम्ब नाश किया। यह कहानी तो आप सभी जानते हैं। रावण के अन्त के बाद तीनों लोकों के प्राणी, देवता, यक्ष, गन्धर्व, किन्नर तथा समस्त चराचर जीव भगवान राम तथा विष्णु का जय-जयकार करने लगे।
इस प्रकार रावण वध से प्रसन्न हो समस्त देवताओं ने आकाश से पुष्प वर्षा की। रामचन्द्रजी ने समस्त राक्षस जाति समेत रावण का वध करने के बाद उसके छोटे भाई विभीषण को राजा बनाकर वापस अयोध्या लौट आये। चारों दिशाओं में मंगल-ही- मंगल हो गया तथा सभी ने इस विजय की खुशी में घी के दीपक जलाये। जिसे आज भी संसार में दीपावली पर्व के रूप में मनाते हैं।
श्री रावण संहिता
