वास्तू शास्त्र ओर House asper vastu shastra

वास्तु शास्त्र

वास्तू शास्त्र के अनुसार हमारा मकान / घर कीस तरहसे होणा चाहिए ?

वास्तु शास्त्र में दिशाओं को भी तर्कों के आधार पर धर्म से जोड़ा गया है इस सभी दिशाओं की अपनी विशेषता है और महत्व है| उद्गारणार्थ के पूर्व दिशा से सूर्य उदित होता है अतः सूर्य उपासना में पूर्व का महत्व है|| वास्तु शास्त्र में सूर्य की जीवन दाहिनी ऊर्जा के कारण ही पूर्व दिशा को प्रधानता दी गई है लाखों वर्ष पहले ही ऋषि मुनियों ने पूर्व दिशा में उपासना करना श्रेष्ठ माना है| जिस पर वास्तु शास्त्र ने अपने नियम बनाए हैं वास्तु शास्त्र पंचतत्व एवं दिशाओं पर आधारित है, कहते हैं की दिशाएं दशा बदलती है सो वह काफी हद तक ठीक है और इसी सूत्रा पर पूरा वास्तु शास्त्र आधारित है| बहुत से लोगों ने जब वास्तु अनुसार अपने घर घर में परिवर्तन किया तो उनको अपार सफलता मिली पहले से चली आ रही समस्याओं से मुक्ति भी मिली|

कौन सी दिशा किस प्रकार से है|

वास्तूशास्त्र के अनुसार पूर्व दिशा

अरुणोदय या सूर्योदय होने वाली दिशा को पूर्व कहा जाता है| विभिन्न वस्तु ग में इसके लिए प्रज्ञा प्राची आदि विशेषनो का प्रयोग किया गया है| पूर्व दिशा पितृ स्थान की सूचक है| ऐसा माना गया है कि पितरों की उपासना इसी दिशा की ओर मुंह करके की जाती है| अग्नि तत्व भी पूर्व दिशा द्वारा प्रभावित होता है इस दिशा के स्वामी इंद्रदेव है| बी पूर्व ओजस्वी करने का प्रवेश द्वार है| अतः वास्तु निर्माण में इस दिशा को सदैव खाली छोड़कर करने को स्वतंत्र रूप से प्रविष्ट होने का मार्ग दिया जाता है|

वास्तु शास्त्र
वास्तु शास्त्र दशदिशा

वास्तूशास्त्र के अनुसार पश्चिम

पश्चिम वह दिशा है जहां सायंकाल सूर्य अस्त होता है| वरुण या वायु को इस दिशा का अधिपति देवता है| अतः यह दिशा वायु तत्व को प्रभावित करती है| पश्चिम दिशा को सुख एवं समृद्धि दी कहा गया है| शास्त्रों में कहा गया है कि वायु चंचल और चलायमान है| अतः जिस घर का प्रवेश द्वार पश्चिम दिशा में होता है, उसे घर में निवासी प्रसन्न चित्र तथा विनोद प्रिय होते हैं| यह दिशा प्राय अपना शुभ प्रभाव ही दिखती है|

वास्तूशास्त्र के अनुसार उत्तर

प्रातकाल सूर्य की ओर मुख करके खड़े होने पर ठीक का बाएं हाथ की ओर जो दिशा होती है वह उत्तर है| इस दिशा में रात्रि का ध्रुव तारा दिखाई देता है | यह मात्र भाव को व्यतीत करने वाली आंखें हैं| जल तत्व को इसी दिशा में स्थान मिलना चाहिए| उत्तर मुखी भवन में सदा लक्ष्मी के कृपा दृष्टि बनी रहती है| जो जीवन को धन-धान्य समृद्धि से भर देती है| उत्तर दिशा में लक्ष्मी का स्थिर होना इसलिए माना गया है, क्योंकि ध्रुव तारा भी इसी दिशा में स्थिर है| भवन में सदैव उत्तर दिशा से प्रकाश के आगमन का स्थान रखना चाहिए|

वास्तूशास्त्र के अनुसार दक्षिण

दक्षिण वह दिशा है जो सूर्योदय के समय सूर्य की ओर मुख करने पर दाएं हाथ की ओर हो| यह उत्तर दिशा के ठीक विपरीत होती है| दक्षिण दिशा में पृथ्वी तत्व को व्याप्त माना गया है| यह की स्वामित्व वाली इस दिशा को मुक्ति कारक कहा गया है| दक्षिण मुखी प्रवेश द्वार वाले भवन स्वामी की प्रकृति में धैर्य तथा स्थिरता का विशेष ध्यान रखना है| इस दिशा के बारे में अनेक ग में कुछ शुभ और अशुभ लक्षणों की बात कही गई है|

वास्तूशास्त्र के अनुसार ईशान

किशन एक विदिशा है अर्थात दो दिशाओं उत्तर पूर्व से निर्माण कौन है| यह चारों कोनों में सर्वाधिक पवित्र है| अतः एवं इस आराधना साधना विद्यार्जन लेखन एवं साहित्यिक गतिविधियों हेतु शुभ माना गया है| यह कौन मनुष्य को बुद्धि ज्ञान विवेक धैर्य तथा साहस प्रदान करके सभी कासन से मुक्ति दिलाता है| इतने पूजनीय कौन को सदा पवन एवं स्वच्छ रखा जाना चाहिए|

वास्तूशास्त्र के अनुसार अग्नि

दक्षिण पूर्व दिशा को मिलने वाला कौन अग्नि कौन कहलाता है | यह स्वास्थ्य प्रदाता है| इस विदिशा में स्थिर माना गया है| इसका कारण है कि यह कौन पूर्व एवं दक्षिण के ठीक मध्य में स्थित है| यदि भवन के अग्रिया कोने में गंदगी या दूषित पदार्थों का अस्तित्व हो तो वहां के लोगों के स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ता है| इस कोने में बिजली के उपकरणों तथा लोहे के सामानों को स्थान दिया गया है| यदि इन| सावधानियां को दृष्टिगत ना रखा जाए तो अग्नि द्वारा भीषण नानी की संभावना बनी रहती है |

वास्तूशास्त्र के अनुसार नौरुत्या

दक्षिण एवं पश्चिम दिशा को मिलने वाला कौन है यह विदिशा शत्रुओं का नाश करती है| इसका स्वामी राक्षस है|| कई बार इस दिशा के कारण मनुष्य और समय कल ग्रास बन जाता है| यदि आवासीय भवन में इस्कॉन को दूषित रखा जाए तो उसमें रखने वाले मनुष्य का चरित्र| दूषित होता है तथा शत्रु पक्ष प्रबल रहता है इस विदिशा के प्रभाव से ही भवन पर भूत प्रेत आदि की छाया बनी रहती है| इन सभी दुष्प्रभाव के कारण मनुष्य आकस्मिक संकटों के जाल में फंसा रहता है|

वास्तूशास्त्र के अनुसार वायव्य

वायव्य का तात्पर्य उसे कौन से है, जो उत्तर और पश्चिम दिशा को मिलता है| वायु को के प्रभाव अंततः सुबह फलदाई होते हैं| यह मनुष्य को दीर्घायु, स्वास्थ्य, तथा शक्ति प्रदान करता है| इस दिशा में हमेशा शुद्धता रहनी चाहिए| यदि यह किसी कारणवश दूषित हो जाए तो अपने विपरीत प्रभाव से भवन के निवासियों को पीड़ा पहुंचती है| ऐसे में मित्र भी शत्रु वर्ष व्यवहार करने लगते हैं| शक्ति सामर्थ्य का और असमय ह्रास होता है| यह सब इस कारण होता है,| क्योंकि घर का मुखिया अहंकारी हो जाता है उसकी मति भ्रष्ट हो जाती है

किस दिशा में कौन सी वस्तु रखना चाहिए?

पूर्व और उत्तर की दिशा हल्की एवं दक्षिण पश्चिम की दिशा भारी होनी चाहिए जमीन एवं हमारा घर उत्तर पूर्व की तरफ नीचा होना चाहिए एवं दक्षिण व पश्चिम की तरफ ऊंचा होना चाहिए|
किसी भी घर में चाहे वह छोटा हो या बाद एक देवस्थान का होना आवश्यक है और यह देवस्थान सदैव उत्तर पूर्व कोन मे होना चाहिए यानी की नॉर्थ ईस्ट की साइड में होना चाहिए इस दिशा को ईशान्य कौन भी कहते हैं यह क्षेत्र जल के लिए होता है| अतः इस क्षेत्र में जलाशय, जल संचय या जल संबंधित रखना चाहिए, इसी दिशा में विद्यार्थियों के लिए विद्या कक्षा भी आप बना सकते हो और इसी दिशा में हमें फिश टैंक भी रखना चाहिए| दिशा पर वजन का ना होना ही शुभ होता है| इस ईशान कोण को छोड़ते हुए बहुत ही हल्के समान पवित्र पदार्थ की इस क्षेत्र में रखनी चाहिए|
घर का दक्षिण पूर्व क्षेत्र को आग्नेय कोना कहते हैं | ऐसा दिशा में रसोई घर का निर्माण शुभ फल देता है | यदि किसी कारण से इस दिशा में रसोई घर बना नहीं सकते हो तो उत्तर पश्चिम कौन पर उसे रखना चाहिए|

घर का उत्तर पश्चिम क्षेत्र यानी कि वायव्य कौन कहलाता है| इस कोने को खुला होना श्रेष्ठ होता है अतः खिड़कियों एवं बालकनी के लिए भी यह कोना अत्यंत शुभकारी होता है|
घर का दक्षिण पश्चिम क्षेत्र को नैऋत्य कौन कहलाता है यह खुला हुआ न रहे अथवा ऐसा तरफ बहुत ही जरूरी हो तो काम खुला रखें यह सब क्षेत्र में जिसका अधिक वजन होगा उतना ही शुभ है| मुख्य कक्ष नैरृत्य क्षेत्र में होना चाहिए|

घर का केंद्र और इसी प्रकार प्रत्येक कमरे का केंद्र सदैव खाली रहना चाहिए यह ब्रह्मस्थान कहलाता है| ब्रह्मस्थान स्वच्छ तथा दबा हुआ नहीं होना चाहिए
बच्चों का शयनकक्ष पूर्व में और अध्ययन कक्ष इंसानियत क्षेत्र में होना शुभ है कुंवारी लड़कियों के लिए चयन कक्षा वायव्य क्षेत्र में होना शुभ फल देता है

इसी प्रकार इन छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखकर एक छोटा सा मकान भी आपके लिए अत्यंत शुभकारी फल लेकर आ सकता है और आपकी ग्रोथ कोई भी नहीं रोक सकता है|
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