वैदिक ज्योतिष का खगोलिय आधार: राशियाँ और उनके अधिपति परिचय भारतवर्ष में ‘एस्ट्रोलोजी'( Astrology ) को ‘ज्योतिष’ कहते है। संस्कृत भाषा का यह शब्द ‘ज्योति’ और ‘ईश’ से मिलकर बना है। क्रमश: जिनका अर्थ प्रकाश और प्रभु से है। ज्योतिष प्रकाश का विज्ञान है, खगोलिय पिण्डों के प्रकाश का तथा आत्मा के भीतर के प्रकाश का विज्ञान। प्राचीन ऋषियों द्वारा प्रदत्त मानवता पर यह उपहार अर्पित है। पीढ़ी दर पीढ़ी हमें यह मौखिक एवं लिखित रुप में मिलता रहा है। ज्योतिष शास्न्न हमें ग्रह और नक्षन्नों (सितारों) के मानव मान्न पर पड़ने वाले प्रभावों का ज्ञान देता है, इसी प्रकार राष्ट्र और ब्रह्मण्ड (सृष्टि) पर पड़ने वाले प्रभाव बताता हैं। यह हमारे जीवन पर प्रकाश डालता है। vaidik jyotish
वैदिक ज्योतिष, सितारों तथा ग्रहों की स्थिति ज्ञात करने के लिए अत्यन्त सही खगोलीय गणना, जातक का भविष्य बताने के लिए, सांसारिक घटनाक्रम जानने के लिए करता है। ज्योतिष का उल्लेख भविष्यसूचक ज्योतिष ज्ञान के रुप में है। ज्येातिष के बहुसंख्यक व्यावहारिक प्रयोग है। जिनमें से प्रमुख है, किसी के भावी जीवन की घटनाएँ बताना। इसी तरह आकाशीय पिण्डों का हमारे जीवन पर प्रभाव, और कौन से विशेष ग्रह हमारे जीवन के क्षेत्र विशेष में अनुकूल और प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं। मानव जीवन सृष्टि की रचना है, जबकि जीवन के अस्तित्व के तथ्य, भूत वर्तमान और भविष्य ग्रहों और सितारों से प्रभावित होते हैं। वैदिक ज्योतिष के द्वारा हम व्यक्ति विशेष के जीवन के विभिन्न क्षेत्रों के कर्म की गुणात्मकता एवं तीव्रता का (गहनता का) विश्लेषण और व्याख्या कर सकते हैं।
वैदिक ज्योतिष का प्रमुख क्षेत्र ‘उपाय’ (संस्कृत का शब्द प्रणाली के लिए) है। यह वह ज्ञान है जो ग्रहों के दुष्परिणामों को सुधार सकता है तथा अनुकूलता में वृद्धि कर सकता है। वैदिक ज्योतिष ने ऐसे उपकरण हमें दिये हैं जिनसे हम भविष्य सूचक तथा भावी समय और घटनाओं का जो किसी व्यक्ति के जीवन में घटने वाली है, का ज्ञान करवाता है। इससे भी अधिक जीवन मूल्यों में सुधार और अस्तित्व के आनन्द को बढ़ाता है। वैदिक ज्योतिष का खगोलिय आधारराशियों का क्षेत्र अन्तरिक्ष में कान्ति वृत्त के एक छोर से दूसरे छोर तक है। ये राशियाँ उस क्षेत्र को घेर लेती हैं जिसमें से ग्रह अपने परिक्रमा पथ पर घूमते हुए परिभ्रमण करते हैं।वैदिक ज्योतिष नक्षत्र राशि काम में लाता है जो कि पश्चिमी ज्योतिष के उष्ण कटिबन्ध राशि चक्र से पूरी तरह भिन्न है। जबकि पश्चिमी ज्योतिष में बसन्तकालीन विषुव को (बसन्त आगमन के साथ सूर्य की स्थिति) आरम्भिक बिन्दु मानकर, इसका प्रयोग राशिचक्र को मापने के लिए होता है। वैदिक ज्योतिष, स्थिर तारों के प्रयोग से राशि चक्र के विभिन्न खण्डों का पता लगाती है। नाक्षत्र एवं उष्ण कटिबन्धीय राशियों का आरम्भिक बिन्दू एक ही समय में 25,800 वर्षों में एक बार पड़ता है। उसके उपरान्त प्रारम्भिक बिन्दु एक दूसरे से अलग होता है, प्रति 72 वर्ष में वृतांश पर लगभग एक अंश/नक्षत्र और उष्ण कटिबन्धीय राशियों के आरम्भिक बिन्दु का समयानुसार अन्तर अयनांश (क्षेत्र विशेष में) कहलाता है। गत प्रारम्भिक दो चरणों के साथ-साथ होने के वर्ष पर विवाद है।
वैदिक ज्योतिष की कई शाखाओं द्वारा कई अयनांश प्रयोग किये गये हैं। उनमें से कुछ लहरी़, कृष्णामूर्त्ति, रमन और फाल्गुन अयनांश हैं । लहरी इनमें से सर्वाधिक उपयुक्त हुआ है। यह अयनांश गत आरम्भिक चरणों का 285 ए.डी. में साथ-साथ होना मानता है।लहरी अयनांश आपके जन्म के समय, -24:12:31 अंश का है।अगर आप अपना (वैदिक) नाक्षत्र ग्रह स्थिति को (उष्ण कटिबन्धीय) पाश्चात्य के अनुसार बदलना चाहते हैं तो आपको इस अयनांश को नाक्षत्र ग्रहों के अंशों को जोड़ना होगा। यदि पाश्चात्य ज्योतिष को वैदिक ज्योतिष के अनुसार बदलना चाहते हैं तो अयनांश को घटाना पड़ेगा।उदाहरण के लिए आपका सूर्य 06:53 स्थित है। राशि में कुंभ अंश पर आपकी वैदिक कुण्डली में है। आप जब उसमें अपने जन्म के समय के अयनांश को जोड़ते हैं जो -24:12:31 अंश है तो आप पाश्चात्य ज्योतिष के अनुसार अपनी कुण्डली में सूर्य की स्थिति पा लेंगे। जोकि मीन राशि में स्थित होने पर होगी। इस तरह आपका नाक्षत्र ज्योतिष की सूर्य राशि कुंभ और पाश्चात्य ज्योतिष के अनुसार सूर्य राशि मीन होगी। वैदिक ज्योतिष फलित कैसे होती हैभविष्य सूचक उद्देश्य से ज्योतिष, ग्रहों की स्थिति, राशि के साथ सम्बन्ध व्यक्ति विशेष के जन्म के समय का, अध्ययन करता है। ये स्थिति, उस समय की सृष्टि की स्थिति को व्यक्त करती है। एक तरह से ग्रह नौ, मापने के विशेष बिन्दु हैं जिनके माध्यम से समस्त स्वाभाविक सुक्ष्म स्थिति या नियमों का आकलन किया जा सकता है। जन्म के समय जब शरीर धरा पर जन्म लेता है तो ब्रह्माण्ड की स्थिति व्यक्ति के जीवन और व्यक्तित्व को बनाने में योगदान देती है। यद्यपि इन्हें मापने के नौ बिन्दु हैं।
नवग्रह जोकि जीवनकाल की समस्त घटनाओं और परिस्थितियों के कारण बनते हैं। नवग्रहहम नौ ग्रहों का उल्लेख करते हैं। यद्यपि ये सभी वास्तविक ग्रह नहीं हैं। केवल इनमें से पाँच ग्रह हैं । एक तारा है एक चन्द्रमा हैं बाकि दो विशेष गणितीय बिन्दु हैं। सूर्य, चन्द्र, बुध, बृहस्पति, शुक्र और शनि से सभी परिचित हैं। इस समूह में दो राहू और केतू चन्द्र के उत्तरी और दक्षिणी आरोहपात और अवरोहपात हैं। इनका भौतिक अस्तित्व नहीं है। ये दो गणितीय बिन्दु हैं जो कि चन्द्रमा के परिक्रमा पथ के तल के तथा पृथ्वी के कान्ति वृत्त के तल के प्रतिच्छेदन के बिन्दु हैं। चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहण तभी होते हैं। जब सूर्य और चन्द्रमा के समीप एक राहू या केतू आ जाते हैं। अब हम ग्रहो के इस समूह का संस्कृत भाषा के अनुसार उल्लेख करेंगे। प्रत्येक ग्रह मानव जीवन के निश्चित तथ्यों का प्रतिनिधित्व करता है। परम्परागत वैदिक ज्योतिष नेपच्यून, यूरेनस और प्लूटो को प्रभावों को नहीं मानता। यहाँ ग्रहों के संस्कृत में नाम दिये गये हैं। सन सूर्य है। मून चन्द्र है। मार्स मंगल है। मर्करी बुध है। जुपीटर गुरु है। वीनस शुक्र है। सेटर्न शनि है। (उत्तरी) आरोह पाथ (चन्द्रमा) राहू है।(दक्षिणी) अवरोह पाथ (चन्द्रमा) केतू है। ग्रहों के प्राथमिक और गौण अभिप्राय होते हैं। यहाँ प्राथमिक अभिप्राय (ग्रहों के (मुख्य)) दिये जा रहे हैं जो पाराशर ऋषि द्वारा दिये गये हैं। (लेखक – बृहत्त पाराशर होरा शास्त्र) सूर्य आत्मा का सूचक है।चन्द्र मस्तिष्क का सूचक है।मंगल उर्जा का सूचक है।बुध वाणी का सूचक है।गुरु ज्ञान का सूचक है।शुक्र उत्पादन का सूचक है।शनि पीड़ा (व्यथा) का सूचक है। बारह राशियाँ ग्रह निरन्तर राशि चक्र के बीच भ्रमण करते रहते हैं। राशियों के इस वृत्त को बारह समान भागों में बाँटा गया है। इन्हें हम राशि कहते हैं। प्रत्येक राशि अन्तरिक्ष में 30 अंश रखती है। प्रत्येक राशि का अनोखा लक्षण होता है जो किसी ग्रह के विचरण करते समय उसे प्रभावित करता है। राशियों के वातावरण में ग्रह जो अनुभूत करते हैं वैसा ही उनका व्यवहार होता है। यहाँ बारह राशियाँ तालिका में स्वाभाविक क्रम से रखी गई हैं।
1. मेष 2. वृष 3. मिथुन 4. कर्क 5. सिंह 6. कन्या 7. तुला 8. वृश्चिक 9. धनु 10. मकर 11. कुंभ 12. मीन राशि
अधिपतिप्रत्येक राशि का अपना विशिष्ट ग्रह, स्वामी होता है। सूर्य और चन्द्र दोनों एक-एक राशि के स्वामी हैं जबकि बाकि ग्रह दो-दो राशियों के स्वामी होते हैं। परम्परागत रुप से राहू और केतू किसी भी राशि के स्वामी नहीं होते। यद्यपि कुछ ज्योतिषि राहू और केतू को कुंभ और वृश्चिक राशि का सह-स्वामी मानते हैं। राशियों के स्वामी का स्थायी महत्व होता है। मेष का स्वामी मंगल है।वृष का स्वामी शुक्र है।मिथुन का स्वामी बुध है।कर्क का स्वामी चन्द्र है।सिंह का स्वामी सूर्य है।कन्या का स्वामी बुध है।तुला का स्वामी शुक्र है।वृश्चिक का स्वामी मंगल है।धनु का स्वामी गुरु (बृहस्पति) है।मकर का स्वामी शनि है।कुंभ का स्वामी शनि है।मीन का स्वामी गुरु (बृहस्पति) है। बारह भाव राशि चक्र को एक अलग तरीके से भी विभाजित करते हैं। पृथ्वी की स्थिति से सम्बन्ध रखते हुए राशि चक्र को बारह भावों में विभक्त करते हैं। जिस प्रकार ग्रहों की गति राशि में उनके अंश से प्रभावित होती है, उसी प्रकार ज्योतिषीय भावों में ग्रहों के स्थापन से उनकी दैनिक गति (आभासी, पृथ्वी से अनुभूत की गई उनकी आनुपातिक गति) भी प्रभावित होती है। भाव जीवन के पक्षों को दर्शाते हैं। जीवन के क्षेत्र ग्रहों और राशियों से प्रभावित होते हैं जो जिस भाव के स्वामी हों।
बारह भाव मानव मात्र के अस्तित्व की सम्पूर्णता के अनुभव के आधार पर द्योतक हैं। यहाँ प्रत्येक भाव का प्रमुख अर्थ (महत्व) बताया जा रहा है। प्रथम भाव स्वयं का प्रतिनिधित्व करता है।द्वितीय भाव तुम्हारे वित्तीय तृतीय भाव साहस का प्रतिनिधित्व करता है।चतुर्थ भाव तुम्हारे सुख, आनन्द का प्रतिनिधित्व करता है।पंचम भाव तुम्हारी सन्तान का प्रतिनिधित्व करता है।षष्टम भाव तुम्हारे शत्रु का प्रतिनिधित्व करता है।सप्तम भाव तुम्हारे जीवन साथी का प्रतिनिधित्व करता है।अष्टम भाव तुम्हारे दोषपूर्ण बिन्दुओं का प्रतिनिधित्व करता है।नवम् भाव तुम्हारे भाग्य का प्रतिनिधित्व करता है।दशम् भाव तुम्हारे रोजगार का प्रतिनिधित्व करता है।एकादश भाव तुम्हारी आय का प्रतिनिधित्व करता है। द्वादश भाव तुम्हारी प्रत्येक वस्तु के अन्त का प्रतिनिधित्व करता है। अभी तक हमने ज्योतिष के प्रमुख सिद्धान्तों के तीन घटकों का संक्षेप में अध्ययन किया है (ग्रह, राशियाँ तथा भाव )। राशियों और भावों में ग्रहों की स्थिति जिस सारिणी (मानचित्र) में दर्शाई जाती है। उसे हम जन्म कुण्डली या जन्म पत्री कहते हैं। इन्हीं तीन मुख्य तत्वों के पारस्परिक प्रभावों को समझकर तथा इनका मूल्यांकन कर आपकी जन्म कुण्डली की व्याख्या की जाती है। यहाँ हम तुम्हारी वास्तविक जन्म कुण्डली पर प्रकाश डालते हैं। अभी आप अपनी जन्म कुण्डली को देख रहे हैं। यह उत्तर भारतीय शैली में है जैसा कि आप देख रहे हैं यह 12 अलग-अलग खण्डो में बँटी हुई है। ये खण्ड भाव कहलाते हैं और प्रत्येक भाव अलग-अलग खण्डों में किसी एक राशि द्वारा अधिकृत होता है। ये राशियाँ भाव में अंक के द्वारा दर्शाई जाती है। राशियों की गणना उनके स्वाभाविक क्रमानुसार की जाती है।
(जैसे कि 1 – मेष के लिए 2 – वृष के लिए 3 – मिथुन के लिए 4 – कर्क के लिए और इसी तरह आगे) भावों की गणना वामावर्त दिशा में होती है। इसीलिए राशियों का क्रम जन्म कुण्डली में इस प्रकार है। कुण्डली कक्ष के बीचों-बीच प्रथम भाव कहलाता है। जो राशि प्रथम भाव में होती है वह लग्न कहलाती है। लग्न राशि वह होती है जो आपके जन्म के समय पूर्वी क्षितिज पर होती है। राशि अपनी संख्या से पहिचानी जाती है। प्रथम भाव में जो संख्या 5 लिखी है वह राशि सिंह दर्शाती है, अर्थात् आपकी लग्न सिंह है। प्रथम भाव के बाएँ द्वितीय भाव है। इसमें जो संख्या 6 लिखी है वह राशि कन्या है। इससे आगे वाला तृतीय भाव है । इससे आगे का चतुर्थ भाव, फिर इसी तरह से द्वादश भाव तक हैं। भावों का यह क्रम स्थायी है, उत्तर भारतीय कुण्डली के अनुसार। कुण्डली का ऊपरी मध्य भाव सदैव प्रथम भाव ही रहेगा और निम्न मध्य भाव सदैव सप्तम। यहाँ यह सदैव याद रखना होगा कि जन्म कुण्डली में दर्शाये गये प्रत्येक भाव की संख्या राशि दर्शाती है न कि भाव का क्रमांक। आपकी सुविधा के लिए यहाँ परिदृष्टि है। प्रत्येक ग्रह किसी न किसी भाव में होता है। ग्रहों के कुण्डली में संक्षिप्त नाम लिखे होते हैं।
अब हमें आपकी जन्म कुण्डली का चित्र देख रहे हैं कि तुम्हारे किस भाव में कौन-कौन से ग्रह हैं। कुण्डली में, 7 भाव में, सूर्य को सू. से दर्शाया गया है। चन्द्र (च.) 3 भाव में है।मंगल (मं.) 11 भाव में है। बुध (बु.) 7 भाव में है। वृहस्पति/गुरु (वृह./गु.) 10 भाव में है। शुक्र (शु.) 8 भाव में है। शनि (श.) 7 भाव में है। राहू (रा.) 8 भाव में है। केतु (के.) 2 भाव में है। एक बार फिर आप भावों की संख्या से भ्रमित न हों जैसा कि आप कुण्डली में देख रहे हैं संख्या, राशि की भाव में उपस्थिति दर्शाती है। भाव वामावर्त दिशा में जो कि ऊपरी मध्य भाव से प्रारम्भ होते है, से गिने जाते हैं। इनकी गणना हम प्रथम भाव से ही शुरु करते हैं, यानि प्रथम भाव को भी सम्मिलित करते हैं। जिस भाव से गणना शुरु करते हैं तथा जहाँ तक करते हैं दोनों ही गिने जाते हैं।
उदाहरण के लिए तृतीय भाव लग्न से तृतीय भाव कहलाता है। इसी प्रकार एकादश भाव सप्तम से पाँच भाव दूर है न कि चार। यद्यपि इस ट्यूटोरियल में हम सदैव उत्तर भारतीय पद्धति की कुण्डली के संदर्भ में चर्चा करेंगे परन्तु आपको उत्तर भारतीय और दक्षिण भारतीय कुण्डली की पद्धतियों में भिन्नता भी बताऐंगें। आइये हम आपकी जन्म कुण्डली दक्षिण भारतीय पद्धति के अनुसार भी देखें।
जिस प्रकार उत्तर भारतीय पद्धति में भावों का एक निश्चित क्रम है उसी प्रकार दक्षिण भारतीय पद्धति में राशियों का एक निश्चित क्रम है। मेष राशि सदैव ऊपरी बाएँ दूसरे खण्ड में आती है। वह खण्ड जिसमें लग्न राशि होती है प्रथम भाव कहलाता है। उसके बाद यहाँ भावों का क्रम घड़ी के क्रमानुसार होता है। सामान्यतया प्रथम भाव कर्ण रेखा द्वारा या ‘एस’ चिह्न द्वारा चिन्हित होता है। कुछ ज्योतिषी इसे भी संख्या द्वारा चिन्हित करते हैं जो कि उत्तर भारतीय ज्योतिष से नितान्त विपरीत है क्योंकि यहाँ (उत्तर भारत में) संख्या का अर्थ राशि से है। तथापि दक्षिण भारतीय जन्म कुण्डली में भी भावों में लिखी संख्या राशि केा ही दर्शाती है। 1 – मेष के लिए 2 – वृष के लिए 3 – मिथुन के लिए आदि।
2 Mukhi Rudraksha
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